बुधवार, 7 दिसंबर 2011

प्रबंधकीय विद्यालयों के शिक्षकों ओर अन्य राजकीय सेवकों की लोकतांत्रिक प्रास्थिति में भिन्नता।

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही समस्त विधायी निर्णय लेने के लिये सक्षम हैं । आम जनता द्वारा निर्वाचन के माध्यम से इन जनप्रतिनिधियों का चयन किया जाता है परन्तु केन्द्रीय तथा राज्य दोनों स्तरों पर राज्य सभा तथा विधान परिषद के रूप में स्थायी उच्च सदन की व्यवस्था है। राज्य स्तर के उच्च सदन में स्थानीय निकायों तथा शिक्षकों के लिय निर्वाचन के माध्यम से पृथक-पृथक स्थान निर्धारित होते हैं। इस प्रकार प्रबंधकीय विद्यालयों के शिक्षकों के लिये राज्य के उच्च सदन में अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजने की स्पष्ट व्यवस्था होने से वह राजनैतिक रूप से अपनी स्वतंत्र राय को व्यक्त करने के लिये स्वतंत्र होता है तथा यथा समय अपनी स्वतंत्र राय के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनने हुये उसे विधान परिषद हेतु भेजता भी हैं परन्तु अन्य राज्य कर्मचारियों के पास निर्वाचन से संबंधित अपनी स्वतंत्र राय को व्यक्त करने का इस प्रकार का कोई प्लेटफार्म उपलब्ध नहीं है।

उल्टे किसी भी राज्य कर्मचारी को निर्वाचन संबंधी गतिविधि में संलिप्त होने पर राज्य कर्मचारी आचरण संहिता 1956 के अनुरूप उसे दोषी करार दिया जाता है। प्रबंधकीय विद्यालयों के शिक्षक जो राजकोश से वेतन/भत्ते प्राप्त करते हैं और अन्य राजकीय कर्मचारियों की प्रास्थिति में यह भेद राज्य में उनकी लोकतांत्रिक स्थिति को प्रभावित करता है।


लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की विभिन्न धारायें निर्वाचन से संबंधित अपराधों का वर्णन करती हैं । इसकी धारा 134 निर्वाचन से संबंधित पदीय कर्तव्य के निर्वहन से संबंधित है जिसकी धारा 134-(1) के अनुसार जो कर्मचारी निर्वाचन में संसक्त पदीय कर्तव्य के भंग में किसी कार्य का लोप या युक्तियुक्त हेतुक के बिना दोषी होगा तो वह जुर्माने से जो पांच सौ रूपये तक हो सकेगा, दण्डनीय होगा यह भी कि धारा 134-(1) के अधीन दण्डनीय अपराध संज्ञेय होगा। इसी धारा में
134(क) जोडकर राजकीय सेवकों के लिये निर्वाचन अभिकर्ता, मतदान अभिकर्ता या गणना अभिकर्ता के रूप में कार्य करने को अपराध की श्रेणी में रखते हुये इसके लिये शास्ति का प्राविधान किया गया है।

मूल धारा तथा शास्ति इस प्रकार है

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा (134क) निर्वाचन अभिकर्ता, मतदान अभिकर्ता या गणना अभिकर्ता के रूप में कार्य करने वाले राजकीय सेवकों के लिये शास्तिः-यदि सरका की सेवा में या कोई व्यक्ति किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के निर्वाचन अभिकर्ता या मतदान अभिकर्ता या गणन अभिकर्ता के रूप में कार्य करेगा , तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से , या दोनो से दण्डनीय होगा।

इस प्रकार अन्य राजकीय कर्मचारियों को जहां निर्वाचन कार्यो में सक्रिय भागीदारी के लिये दण्डित किये जाने की व्यवस्था है वही राजकीय शिक्षकों को अपना शिक्षक प्रतिनिधि चुनकर उच्च सदन में भेजे जाने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया निर्धारित है और मेरे विचार में इसके चलते उनकी प्रास्थिति राज्य सरकार के सम्मुख उच्च विचारण की होती है।

कदाचित इसीलिये राजकीय अध्यापक के सम्मुख आयी परेशानियों का संज्ञान लेकर राज्य सरकार उसे अनेक ऐसे अधिकार देने पर राजी हो जाती है जो अन्य राज्य कर्मचारियों को राज्य कर्मचारी आचरण संहिता 1956 के चलते प्राप्त नहीं हो सकते। एक ऐसे ही अधिकार की चर्चा करते हुये उत्तर प्रदेश राज्य के हालिया शासनादेश की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा जिसके अनुसार जनपद स्तरीय कैडर का होने के बावजूद अध्यापको को अपने मनचाहे जनपद में स्थानान्तरण हेतु आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गयी है और इस व्यवस्था को पारदर्शी तथा शिक्षकों के लिये उत्पीडन रहित बनाने के लिये आन लाइन आवेदन करने की व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा की गयी हैं। ...


राज्य सरकार के अन्य कर्मचारी और अधिकारीगण जो प्रदेश स्तरीय सेवा के सदस्य होते हैं उन्हें भी अपने मनचाहे जनपद में स्थानान्तरण हेतु आवेदन करने की स्वतंत्रता क्यों नहीं देनी चाहिये जबकि लोकतंत्र का चौथा खम्भा लगातार राजकीय कर्मचारियों के स्थानान्तरण को एक उद्योग की श्रेणी में वर्गीकृत करते हुये उसे कर्मचारियों के उत्पीडन का औजार घोषित करने पर उतारू है ??
यह बात कम से कम मेरी समझ में तो नहीं आती।

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